Wednesday, 25 March 2015

क्यों होते हैं आप बीमार ?


आयुर्वेद की हमारे रोजमर्रा के जीवन, खान-पान तथा रहन-सहन पर आज भी गहरी छाप दिखाई देती है । आयुर्वेद की अद्भूत खोज है - ‘त्रिदोष सिद्धान्त’ जो कि एक पूर्ण वैज्ञानिक सिद्धान्त है और जिसका सहारा लिए बिना कोई भी चिकित्सा पूर्ण नहीं हो सकती । इसके द्वारा रोग का शीघ्र निदान और उपचार के अलावा रोगी की प्रकृति को समझने में भी सहायता मिलती है ।


त्रिदोष अर्थात् वात, पित्त, कफ की दो अवस्थाएं होती है - 
 1. समावस्था (न कम, न अधिक, न प्रकुपित, यानि संतुलित, स्वाभाविक, प्राकृत) 
 2. विषमावस्था (हीन, अति, प्रकुपित, यानि दुषित, बिगड़ी हुर्इ, असंतुलित, विकृत) । 

वास्तव में वात, पित्त, कफ, (समावस्था) में दोष नहीं है बल्कि धातुएं है जो शरीर को धारण करती है तभी ये दोष कहलाती है । इस प्रकार रोगों का कारण वात, पित्त, कफ का असंतुलन या दोष नहीं है बल्कि धातुएं है जो शरीर को धारण करती है और उसे स्वस्थ रखती है । जब यही धातुएं दूषित या विषम होकर रोग पैदा करती है, तभी ये दोष कहलाती है ।  


अत: रोग हो जाने पर अस्वस्थ शरीर को पुन: स्वस्थ बनाने के लिए त्रिदोष का संतुलन अथवा समावस्था में लाना पड़ता है ।  

स्वास्थ्य के नियमों का पालन न करने, अनुचित और विरूद्ध आहार-विहार करने, ऋतुचर्या-दिनचर्या, व्यायाम आदि पर ध्यान न देने तथा विभिन्न प्रकार के भोग-विलास और आधुनिक सुख-सुविधाओं में अपने मन और इन्द्रियों को आसक्त कर देने के परिणाम स्वरूप ये ही वात, पित्त, कफ, प्रकुपित होकर जब विषम अवस्था में आ जाते हैं जब अस्वस्थता की स्थिति रहती है। 

अत: अच्छा तो यही है कि रोग हो ही नही । इलाज से बचाव सदा ही उत्तम है ।
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रोगों पर आरम्भ से ध्यान न देने से ये प्राय: कष्टसाध्य या असाध्य हो जाते हैं । अत: साधारण व्यक्ति के लिए समझदारी इसी में है कि यह यथासंभव रोग से बचने का प्रयत्न करे, न कि रोग होने के बाद डॉक्टर के पास इलाज के लिए भागें ।


वात प्रकोप के लक्षण:
  1.  शरीर का रूखा-सूखा होना ।
  2.    धातुओं का क्षय होना या तन्तुओं के अपर्याप्त पोषण के कारण
  3.  शरीर का सूखा या दुर्बला होते जाना।
  4.   अंगों की शिथिलता, सुत्रता और शीलता।
  5.   अंगों में कठोरता और उनका जकड़ जाना।
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पित्त-प्रकोप के लक्षण
1 शरीर में दाह (जलन)/आंखों में लालिमा और जलन। हृदय, पेट, अन्नतालिका, गले में जलन प्रतीत होना। 
2 गर्मी का ज्यादा अनुभव होना।
3 त्वचा का गर्म रहना, त्वचा पर फोड़े-फुंसियों का निकालना और पकना।
4 त्वचा, मूल, मूत्र, नेत्र, आदि का पीला होना।
5 कंठ सूखना, कंठ में जलन, प्यास का अधिक लगना।
6 मुंह का स्वाद कड़वा होना, कभी-कभी खट्टा होना।
7 अम्लता का बढ़ना, खट्टी डकारें, गले में खट्टा-चरपरा पानी आना।
8 उल्टी जैसा अनुभव होना या जी मिचलाना, उल्टी के साथ सिरदर्द होना।
9 पतले दस्त होना।     
कफ प्रकोप के लक्षण-
1 शरीर भारी, शीतल, चिकना और सफेद होना।
2 अंगों में शिथिलता व थकावट का अनुभव होना। आलस्य का बना रहना ।
3 ठंड अधिक लगना ।
4 त्वचा चिकनी व पानी में भिगी हुई सी रहना।
5 मुंह का स्वाद मीठा और चिकना होना। मुंह से लार गिरना।
6 भूख का कम लगना। अरुचि व मंदाग्नि।
7 मल, मूत्र, नेत्र ओर सारे शरीर का सफेद पड़ जाना। मल में चिकनापन और आंव का आना।
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Friday, 20 March 2015

पेट की चर्बी से छुटकारा दिलाएंगे ये 7 घरेलू नुस्खे


कंप्यूटर से तेज दिमाग की चाहत है तो डाइट में जरूर लें ये चीजें..


शहद 
में विटामिन बी, एंटीऑक्सीडेंट्स, पोटैशियम, फॉस्फोरस और मैग्नीशियम अच्छी मात्रा में है जो दिमाग की सेहत के लिए फायदेमंद है।

जामुन 
में एंटीऑक्सीडेंट्स प्रचुरता में हैं जो याददाश्त तेज रखने में मदद करते हैं और एकाग्रता बढ़ाते हैं।
बादाम 
 में एंटीऑक्सीडेंट्स, विटामिन बी6, ई और ओमेगा 3 फैटी एसिड अच्छी मात्रा में होते हैं जो दिमाग को सक्रिय रखने में मदद करते हैं।
अखरोट 
में भी बादाम जैसे गुण हैं जैसे एंटीऑक्सीडेंट्स, ओमेगा 3 फैटी एसिड औरविटामिन ई जो दिमाग के लिए फायदेमंद हैं।
 
प्याज 
में क्वेरसेटिन नामक एंटीऑक्सीडेंट है जो दिमाग तक रक्त संचार को सुचारू करता है।

आंवला 
 में विटामिन सी और एंटीऑक्सीडेंट्स अच्छी मात्रा में हैं जो दिमाग को सक्रिय रखने में मददगार हैं।
 


 

एसिडिटी से परेशान हैं तो अपनाएं ये आसान उपाय..



अगर आप इन दिनों खानपान की जरा सी चूक की कीमत अक्सर एसिडिटी या गैस्ट्रिक के रूप में चुका रहे हैं तो इससे तुरंत आराम के लिए ये आसान उपाय आपकी मदद करेंगे।

लौंग
एसि़डिटी या गैस्ट्रिक की स्थिति में दो लौंग चबाएं। इसके रस से एसिडिटी में तुरंत राहत मिलती है।


जीरा
एक चम्मच जीरा तवे पर भुन लें। भुनने के बाद उनके हल्का पीस लें और एक ग्लास पानी में मिलाएं। भोजन के बाद इसे जरूर लें।

गुड़
एसिडिटी या सीने में जलन की स्थिति में गुड़ का एक टुकड़ा चूसें। हां, डायबिटीज के मरीज इस नुस्खे को न आजमाएं।

तुलसी पत्ता
तुलसी पत्ते का सेवन भी एसिडिटी में आराम दिलाता है। पांच से छह तुलसी पत्ते या फिर तुलसी की चाय का सेवन करें, तुरंत आराम महसूस करेंगे।

छाछ
छाछ पेट को ठंडक पहुंचाने में काफी मददगार है। इसमें एक चौथाई चम्मच काली मिर्च मिलाकर इसका सेवन करें। इसे एसिडिटी से तुरंत राहत मिलेगी।

अदरक
भोजन से आधा घंटा पहले अदरक का छोटा टुकड़ा खाएं। इससे एसिडिटी और अपच जैसी समस्या में आराम मिलेगा।

Wednesday, 11 February 2015

कैंसर सेलों की कार्यप्रणाली



हर मानव शरीर में सेलों की बढ़त नियंत्रित रूप से होती है। नवीन सेल शरीर में उतने ही पैदा होते है जितने की शरीर को आवश्यकता होती है या सेल मर जाते है उनके स्थान को भरने के लिये इनकी बढ़त होती है किंतु ट्यूमर सेलों का एक समूह होता है जो कि अनियंत्रित रूप से बढ़ता है और विकसित होता है। उनकी बढ़त नियंत्रित नहीं होती है। ये ट्यूमर दो प्रकार के होते है जिसमें पहला बीनायन (Benign) जिसे कैंसर रहित कहा जाता है और दूसरा मेलिगनेन्ट(Malignant) जिसे कैंसर वाला कहा जाता है। बीनायन ट्यूमर की बढ़त बहुत धीमी होती है ये फैलते नहीं है। जबकि मेलिगनेंट ट्यूमर तेजी के साथ बढ़ते है और अपने पड़ोसी सामान्य टिश्युओं को नष्ट करते है। ये संपूर्ण शरीर में फैल जाते है। कैंसर शब्द का उपयोग उस समय किया जाता है जब मेलिगनेन्ट ट्यूमर होता है जो अपनी असीमित बढ़त से मानवीय शरीर को प्रभावित करने लगता है। यह कैंसरसेलों को मानवीय टिशुओं मंे प्रविष्ट करता है व ट्यूमर अन्य टिशुओं में कैंसर के सेलों को भेजने लगता है।
वास्तविक ट्यूमर को ‘‘प्राथमिक ट्यूमर’’ नाम दिया गया है। सेल्स इस ट्यूमर से संपूर्ण शरीर की यात्रा कर सकते है और शरीर के विभिन्न अंगों में नवीन ट्यूमरों का निर्माण कार्य प्रारंभ कर सकते है। दूसरे सेकेन्डरी ट्यूमर होते है जो कैंसर से युक्त सेल रक्त के माध्यम से या लिम्फेटिक प्रणाली के माध्यम से शरीर की यात्रा कर सकते है। लिम्फेटिक सिस्टम छोटी-छोटी रक्त वाहिकाओं की नालियाँ होती है जो सेलों से उत्सर्जित पदार्थ एकत्रित करती है और इसे बड़ी वेसल में ले जाती है और अंत में उसे लेम्फनोड मंे डाल देती है। यह तरल पदार्थ जो लिम्फ फ्लूड के नाम से जाना जाता है, रक्त वाहिकाओं में डाल दिया जाता है।




Cancer Treatment, AIDS Treatment, Hepatitis Treatment   

Sunday, 8 February 2015

क्या हैं इबोला के लक्षण ?


क्या हैं इबोला के लक्षण ? 
इबोला के लक्षण फ्लू से काफी मिलते जुलते हैं। लेकिन कुछ लोगों को यह ज्यादा प्रभावित भी कर सकता है। जैसे की आंखों और कानों से खून का निकलना, मसूरे से खून निकलना, जबकि कुछ लोग अति कमजोर हो सकते हैं। वहीं, इससे प्रभावित लोगों को बहुत जल्दी थकान घेर लेती है।

इबोला के लक्षण :

वायरस से संपर्क में आने के 4 से 5 दिनों में दिखने लगते हैं।
पहले 1 से 3 दिनों में कमजोरी और फ्लू जैसे लक्षण होते हैं।
4 से 7 दिनों में डाइरिया, उल्टी होना, सिरदर्द, रक्तचाप कम होना और अनेमिया से ग्रसित होना।
जबकि 7-10 दिनों के अंदर आंतरिक और आंखों, कानों से खून का निकलना, कोमा में जाना।

क्या करता है यह वायरस ?

इबोला वायरस जैसे ही किसी शरीर के संपर्क में आता है, यह शरीर के कोशिकाओं में घुस जाता है और खुद को कई गुणा बढ़ाता जाता है। कई गुणा बढ़ने का बाद ये सारे वायरस निकल कोशिकाओं से निकल जाते हैं और फिर एक प्रकार की प्रोटीन को उत्पन्न करते हैं। जिससे शरीर के अंदर यह पूरी तरह से तबाही मचा देता है। इबोला व्यकित के इम्यून सिस्टम को भी प्रभावित करता हैं। यह इम्यून कोशिकाओं में घुस कर शरीर के विभिन्न भाग में चला जाता है। जैसे कि लीवर, गुर्दा और मस्तिष्क। यह शरीर की प्रतिरक्षक क्षमता को कम करता जाता है। इबोला वायरस का हमला करना और गुणा होने की क्षमता बहुत ही तीव्र गति से होती है। जिसका परिणाम फ्लू जैसे लक्षण की तरह हमारे सामने आता है।


Cancer Treatment, AIDS Treatment, Hepatitis Treatment   

Friday, 6 February 2015

Research on Ayurvedic Cancer Medicine

लावण्या आयुर्वेद में कैंसर की दवा पर हुआ रिसर्च

लावण्या आयुर्वेद ने कैंसर की आयुर्वेदिक दवा बना ली है

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में लावण्य आयुर्वेद एक ऐसी संस्था है जो आयुर्वेद को वैज्ञानिक स्तर पर लाने हेतु संकल्पित है इस संस्था ने आयुर्वेद से ही कैंसर एड्स हेपटाइटस जैसे असाध्य रोगो का सफलता पूर्वक इलाज़ किया है जिसकी वैज्ञानिक स्तर पर प्रमाणित रिपोर्ट्स इसकी वेबसाइट http://lavanyaayurveda.com/ पर देख सकते हैं. लावण्य मैं कैंसर के २०००० से ज्यादा मरीज़ का सफलतापूर्वक इलाज़ हुआ । रिपोर्ट देखने के लिए यहाँ क्लिक करें http://lavanyaayurveda.com/